Circulatory System in hindi || परिसंचरण तंत्र (B.ed)

Hindi Meaning of Circulatory System – परिसंचरण तंत्र

परिसंचरण तन्त्र क्या है? (What is Circulatory System)

शरीर के रक्त परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System) में रक्त, हृदय एवं रक्त वाहिनियों का समावेश होता है। ह्रदय की पम्पिंग क्रिया द्वारा रक्त धमनियों (Arteries) एवं धमनिकाओं से होता हुआ सम्पूर्ण शरीर की कोशिकाओं (Cells) में पहुँचता है।  तथा उनमें ऑक्सीजन (Oxygen), आहार (Food), पानी (Water) एवं अन्य सभी आवश्यक पदार्थ पहुँचाता है और वहाँ से अशुद्ध (Impure) रक्त कोशिकाओं तथा शिराओं (Capillaries and veins) से होता हूआ ह्रदय में वापस आ जाता हे । इस क्रिया को रक्त का परिसंचरण कहते हैं।  

यह तन्त्र या वाहिका तन्त्र अंगों का वह समुच्चय है जो शरीर की कोशिकाओं के मध्य पोषक तत्वों का यातायात करता है। 

मानव एवं अन्य कशेरूक प्राणियों के परिसंचरण तन्त्र ‘बन्द परिसंचरण तन्त्र’ होते हैं। अर्थात् रक्त कभी भी धमनियों, शिराओं एवं कोशिकाओं के जाल से बाहर नहीं जाता है।  अकशेरूकों के परिसंचरण तन्त्र ‘खुले परिसंचरण तन्त्र(Circulatory System) होते हैं। बहुत से प्राथमिक जीवों (Primitive Animals) में  परिसंचरण तन्त्र'(Circulatory System) होता ही नहीं है किन्तु सभी प्राणियों का लसीका तन्त्र (Lymphatic System) एक खुला तन्त्र होता है । 

परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System) का कार्य सम्पूर्ण शरीर के प्रत्येक भाग में रूधिर को पहुँचाना है, जिससे उसे पोषण और ऑक्सीजन प्राप्त हो सके। 

परिसंचरण तन्त्र का कार्य (Functions of Circulatory System)

1)खाद्य पदार्थ का परिवहन  

परिसंचरण तंत्र (Circulatory System) में आहारनाल में पचे हुए खाद्य पदार्थों को शरीर की विभिन्न कोशिकाओं में पहुंचाता है। 

2) ऑक्सीजन का परिवहन-

यह तन्त्र ऑक्सीजन को फेफड़ों की वायु कुपिकाओं से शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाता है । 

3) कार्बन डाई ऑक्साइड का परिवहन-

कोशिकीय श्वसन में उत्पन्न कार्बन डाई ऑक्साइड  को फेफ़डो तक परिवहन का कार्य परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System) ही करता है। 

4) उत्सर्जी पदार्थों का परिवहन-

ऊतकों व कोशिकाओं में उपापचय के फलस्वरूप बने उत्सर्जी या अपशिष्ट पदार्थों के परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System) के द्वारा ही उत्सर्जी अंगों (वृक्क) तक पहुँचाया जाता है।

5) हार्मोन्स का परिवहन

यह तन्त्र हार्मोन्स को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है। 

6) शरीर के ताप का नियमन-

परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System) शरीर के तापमान को स्थिर बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य करता है । 

7) समस्थैतिकता बनाए रखना-

परिसंचरण जल तथा हाइड्रोजन आयनों एवं रासायनिक पदार्थों के वितरण द्वारा शरीर के सभी भागों में आन्तरिक समस्थैतिकता को बनाए रखता है। 

8) शरीर की रोगों से रक्षा करना-

यह शरीर के प्रतिरक्षी तन्त्र का भी कार्य करता है।  यह शरीर में प्रवेश करने वाले रोगाणुओं से शरीर की रक्षा करता है। 

Blood-ciruculation-in-heart
Organ of circulatory System (परिसंचरण तन्त्र का अंग)

परिसंचरण तन्त्र के अंग (Organs of Circulatory System) 

परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System) के अन्तर्गत निम्नलिखित अंग आते हैं। 

1)ह्रदय (Heart) 

2) रक्त वाहिनियाँ (Blood Vessels) 

हृदय (Heart) 

मानव ह्रदय लाल रंग का तिकोना, खोखला एवं माँसल अंग होता है जो पेशीय ऊतकों का बना होता है।  यह एक आवरण द्वारा घिरा होता है जिसे ह्रदयावरण कहते हैं।  इसमें पेरिकार्डियल द्रव्य भरा होता है जो ह्रदय की बाह्य आघातों से रक्षा करता है। हदय पम्प की भाँति कार्य करता है। यह अन्दर के तापमान को बनाए रखने तथा कोशिकाओं को नियमित रूप से सन्तुलित आहार पहुँचाने का कार्य निरन्तर रूप से करता है। यदि हृदय अपना कार्य बन्द कर दे तो शरीर में लेक्टिक अम्ल, एसिड, फॉस्फेट, कार्बन डाई-ऑक्साइड आदि पदार्थों की मात्रा बढ़ने लगेगी जिसके  फलस्वरूप कोशिकाओं में जीवन समाप्त हो जाएगा तथा व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी। हृदय के अध्ययन को कार्डियोलॉजी कहते हैं। एक वयस्क मनुष्य का हृदय एक मिनट में 72 बार धड़कता है जबकि एक नवजात शिशु का 120-60 बार धड़कता है । 

ह्रदय की बाह्य संरचना (External Structure of Heart) 

मनुष्य का हृदय शंक्वाकार पेशीय अंग होता है। इसका ऊपरी भाग कुछ चौड़ा तथा निचला भाग कुछ नुकीला तथा बायीं ओर झुका हुआ होता है।  हृदय के अगले चौड़े वाल्व को अलिन्द (Atrium) तथा पिछले नुकीले भाग को निलय (Ventricle) कहते हैं। दोनों भागों के मध्य अनुप्रस्थ विभाजन रेखा कोरोनरी त्वचा पाई जाती हैं। 

ह्रदय की आन्तरिक संरचना (Internal Structure of Heart) 

मनुष्य का हृदय चार कक्षीय होता है। अलिन्द में एक अन्तरालिन्द भी होता है जो अलिन्द को दाएँ तथा बाएँ अलिन्द में बाँट देता है। इस पर दाईं ओर एक अण्डाकार भाग होता है जिसे फोसा ओवेलिस कहते हैं। दाएँ अलिन्द में पश्च महाशिरा तथा अग्र महाशिरा के छिद्र होते हैं। पश्च महाशिरा के छिद्र पर यूस्टेकियन कपाट पाया जाता है। अग्र महाशिरा के छिद्र के समीप ही एक छिद्र कोरोनरी साइनस होता है। इस छिद्र पर कोरोनरी कपाट या थिवेसियन कपाट पाया जाता है । बाएँ अलिन्द में दोनों फुस्फुसीय शिराएँ एक सम्मिलित छिद्र द्वारा खुलती हैं।  

निलय, अन्तरा निलय पटल द्वारा दाएँ तथा बाएँ निलय में बँटा रहता है।  निलय का पेशीय स्तर अलिन्द से अधिक मोटा होता है। दाएँ निलय से पल्मोनरी वॉल्व निकलता है एवं बाएँ निलय से कैराटिको सिस्टेमिक वाल्व निकलता है जो पूरे शरीर में शुद्ध रक्त पहुंचता है।  इन चापों के  आधार पर तीन-तीन छोटे अर्द्ध चन्द्ररकार कपाट लगे रहते हैं। अलिन्द निलय में अलिन्द निलय छिद्रों द्वारा खुलते हैं। 

इन छिद्रों पर अलिन्द निलय कपाट स्थित होते हैं। ये कपाट रूधिर को अलिन्द से निलय जाने देते हैं किन्तु निलय से अलिन्द में नहीं। निलय की भित्ति तथा कपाटों में हृदय  रज्जु जुड़े रहते हैं। दाएँ अलिन्द व निलय के  मध्य के  अलिन्द-निलय कपाट में तीन वलन होते हैं। त्रिवलनी कपाट कहते हैं। बाएँ अलिन्द व निलय के बीच के कपाट पर दो वलन होते हैं।इसे द्विवलन कपाट या मिट्रल कपाट कहते हैं। 

हृदय का कार्य (Functions of Heart) 

हमारे शरीर का रक्त प्रवाह मुख्यत: ह्रदय के ऊपर ही निर्भर करता है। रक्त का बाएँ निलय से धमनियों में फिर उसके  बाद कोशिकाओं से वापस दाएँ अलिन्द में शिराओं के द्वारा आना, सामान्य प्रवाह कहलाता है। रक्त का बाएँ निलय से फेफड़ों में फिर बाएँ अलिन्द में आना, फेफड़े सम्बन्धी प्रवाह कहलाता है । 

सामान्य प्रवाह में फेफड़े सम्बन्धी प्रवाह की अपेक्षा अधिक शक्ति होती है। अत: हृदय का प्रमुख कार्य शरीर के विभिन्न भागों को रक्त पम्प करना है। यह कार्य अलिन्द व निलय के  लयबद्ध रूप से संकुचन एवं विश्रान्ति (सिकूड़ना व फैलना) से होता है । इस क्रिया में ऑक्सीकृत रक्त फुस्फुस शिरा से बाएँ अलिन्द में आता है वहाँ से बाएँ निलय से होता हुआ महाधमनी द्वारा शरीर में प्रवाहित होता है।  

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रक्त वाहिनियाँ (Blood Vessels) 

शरीर में रक्त परिसंचरण वाहिनियाँ के द्वारा होता है, जिन्हें रक्त वाहिनियाँ (Blood Vessels) कहते हैं।मानव शरीर में निम्न तीन प्रकार की रक्त वाहिनियाँ होती हैं 

1) धमनियाँ (Arteries)-

शुद्ध रक्त को ह्रदय से शरीर के अन्य अंगों तक ले जाने वाली वाहिनियाँ धमनी कहलाती है।  इनमें रक्त प्रवाह तेज व उच्च दाब पर होता है। इसका मुख्य कारण धमनियां का लचीला होना और माँसपेशियों की दीवारों का मोटा होना है। धमनी की संरचना तथा उसकी मोटाई धमनी के आकार पर निर्भर करती है। अधिक फैलाव की शक्ति होने के  कारण धमनियाँ इस योग्य हो जाती हैं कि ह्रदय के संकुचन के परिणामस्वरूप रक्त की जो अतिरिक्त मात्रा धमनियों में आती हैं, वे उसको आराम से अपने अन्दर समाहित कर लेती हैं।

2) शिराएँ (Veins)

ये अंगो से रूधिर को वापस हृदय में लाती हैं । शिराओं की भित्ति महीन व पिचकने वाली होती है। शिराओं में अशुद्ध रूधिर बहता है तथा रूधिर बहुत दाब के साथ बहता है। शिराओं की भित्ति में पेशीय स्तर बहुत पतला होता है। इनकी गुहा काफी चौड़ी होती है तथा इसमें थोड़ी-थोड़ी  दूर पर कपाट लगे होते हैं । ये अर्धचन्द्राकार कपाट रूधिर को एक दिशा में बहने देते हैं । 

3) केशिकाएँ (Capillaries)-

ये शिराओं और धमनियों को आपस में जोड़ती हैं। ऊतकों में पहुँचकर धमनियाँ महीन शाखाओं का जाल बनाती हैं जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं। केशिकाओं की भित्ति केवल अन्तःस्तर (Endothelium) के एक स्तर की बनी होती है। केशिकाओं में रूधिर प्रवाह की गति बहुत धीमी होती है। केशिकाएँ आपस में मिलकर शिराएँ बनाती है।  शिराएँ आपस में मिलकर शिरा बनाती हैं। केशिकाएँ निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं

1)फेनेस्ट्रेटेड केशिकाएँ (Fenestrated Capillaries)

2) निरन्तर केशिकाएँ (Continuous Capillaries)

3)सॉइनोसूडल केशिकाएँ (Sinusoidal Capillaries)

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Sneha Katiyar

My name is Sneha Katiyar. I am a student. I like reading books

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