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महात्मा गाँधी || Mahatma Gandhi ka Jivan Parichay

महात्मा गाँधी का जन्म कब और कहाँ हुआ?  

महात्मा गाँधी (मोहनदास करमचंद गांधी) का जन्म 2 अक्तूबर 1860 को पोरबंदर में हुआ था। यह छोटा सा नगर भारत के पश्चिमी तट पर स्थित था और काठियावाढ़ के अनेक रजवाड़ों में एक था। इसी को आज गुजरात का सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। महात्मा गाँधी का जन्म करमचंद गाँधी की चौथी पत्नी पुतलीबाई के गर्भ से हुआ। वे अत्यंत धार्मिक, सज्जन और निष्ठावान प्रकृति की थीं, और व्रत या पूजापाठ के निर्धारित कर्मकांडों के पालन में कोई ढील नहीं देती थीं। पुत्र का नाम मोहन रखा गया मगर उनकी माता उनको स्नेह से मुनिया कहती थीं।

मुनिया की उम्र सात साल थी, जब उसके पिता की नियुक्ति राजकोट के दीवान के रूप में हो गई। परिवार को पोरबंदर छोड़ना पड़ा। मुनिया को वहां का नीला आकाश, बंदरगाह और आते जाते जहाज़ खूब याद आते थे।  राजकोट में मोहन एक प्राथमिक पाठशाला में और फिर एक हाईस्कूल में भेजे गए। वे परिश्रमी अवश्य थे मगर एक ‘औसत दर्जे के छात्र’ थे, अत्यंत शरमीले और दब्बू स्वभाव के थे, किसी के साथ से घबराते थे और खेलकूद से दूर रहते थे ।

महात्मा गाँधी जी का बाल विवाह 

तेरह साल की आयु में जब मोहन अभी विद्यालय में ही थे। उनकी शादी कस्तूरबाई से कर दी गई जो उन्हीं की उम्र की थीं। उनकी उम्र के लड़के के लिए विवाह का अर्थ उत्सवों और समारोहों, पहनने के लिए नए नए कपडों, कर्णप्रिय संस्कृत मंत्रों के उच्चारण के साथ होने वाले चित्ताकर्षक अनुष्ठानों और स्वयं उसके इन समारोहों का केंद्र होने से अधिक कुछ और नहीं था।  सबसे बड़ी बात यह कि खेलने के लिए एक नया, अजनबी, सुंदर और आज्ञाकारी साथी मिल गया। 

गलत आदतों के शिकार 

मोहनदास ने अपने भाई, शेख और एक दूसरे रिश्तेदार की संगत में धूम्रपान भी सीख लिया था। उन लोगों को सिगरेट खरीदने के लिए थोड़ा-बहुत रुपया भी उधार लेना पड़ता था। इस तरह उनके भाई पर कर्ज हो गया। उसे चुकाने के लिए मोहनदास ने भाई के सोने के कड़े से एक तोला सोना काटकर बेच दिया। यह सब उन्होंने चोरी से किया। चोरी करना बड़ा पाप माना जाता है। वह जानते थे कि उनसे भारी अपराध हो गया है। यह सोचकर उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वह कभी चोरी नहीं करेंगे। पिता करमचंद गांधी को मोहनदास ने अपने अपराध की आत्म स्वीकृति एक कागज पर लिखी और वह कागज अपने बीमार पिता के हाथ में थमा दिया। 

माहत्मा गाँधी की आत्म स्वीकृति

करमचंद गाँधी ने बेटे की आत्म-स्वीकृति को पढ़ा। एक भी शब्द कहे बिना उन्होंने वह कागज़ फाड़ डाला। उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपके। दीर्घ निश्वास लेकर वह फिर से बिस्तर पर लेट गए। मोहनदास कमरे से बाहर आ गए। उनका चेहरा आंसुओं से तर था। उस दिन से मोहनदास अपने पिता को और अधिक प्यार करने लगे। रोज़ वह स्कूल से सीधे घर आते और पिता को सेवा करते, लेकिन पिता की दशा बिगड़ती चली गई और अंत में 1885 में उनकी मृत्यु हो गई। घर में मातम छा गया। महात्मा गाँधी उस समय केवल सोलह वर्ष के थे। 

दो साल बाद उन्होंने हाईस्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और भावनगर की पड़ोसी रियासत के एक कालेज में प्रवेश लिया। क्योंकि तब राजकोट में कोई कालेज नहीं था। उन्होंने यहां पढ़ाई लिखाई को दुष्कर, अंग्रेजी माध्यम को कठिन तथा वातावरण को मैत्री भाव से रहित पाया। परिवार के एक मित्र ने उनको सुझाव दिया कि वे अगर रियासत को सेवा में अपने पिता का स्थान पाना चाहते हैं तो बेहतर है कि इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बनें। मोहन इस विचार पर उछल पड़े। 

महात्मा गाँधी की इंग्लैंड यात्रा 

अब उनकी आत्मा एक बेचैनी से भर उठी । उनका दिल इंग्लैंड जाने के विचारों में रम गया। भाग्य उनको बुला रहा था-हालांकि तब तक उन्हें इसकी शायद ही कोई चेतना रही हो। लेकिन खर्च के लिए धन कहां से जुटाया जाए ? परिवार की आर्थिक स्थिति बुरी थी। मोहन ने छात्रवृत्ति पाने के लिए ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंट से और राजकोट के ठाकुर साहब से संपर्क किया लेकिन उनको मनाने में असफ़ल रहे। बाधाओं से विचलित हुए बिना वे प्रयत्न करते रहे। अंतत: कर्ज लिया गया। मां अपने प्यारे बेटे से बिछुड़ने के लिए तैयार नहीं थीं और डरती थी कि वह एक अजनबी और अधार्मिक देश में जाकर खो जाएगा जहाँ उसके चारों और प्रलोभन ही प्रलोभन होंगे। मां की आपत्ति दूर करने के लिए मोहन उन्हें जितना समझा बुझा सकते थे,  समझाया बुझाया, और व्रत किया कि वे शराब, स्त्रि और मांस से दूर ही रहेंगे । 

वे 4 सितंबर 1888 को साउदेम्प्टन के लिए चल पड़े। तब वे अठारह साल के थे। कुछ ही समय पहले कस्तूरबाई ने उनको एक पुत्ररत्न दिया था। युवा गाँधी को आस पास का सारा वातावरण अजीब लग रहा था। उन्हें घर की याद आने लगी। वहां एक शाकाहारी भोजनालय खोज लेने तक वह लगभग भूखे ही रहे।

विदेशी संस्कृति

उन्होंने दो कमरों का एक मकान किराये पर ले लिया। बढ़िया सिलाई वाले कपड़े खरीदे। एक टोप खरीदा। आईने के सामने खड़े होकर बालों में मांग निकालने और टाई की नाट बांधने में उनका बड़ा  समय लग जाता था। उन्होंने नाच भी सीखा, लेकिन जल्दी ही इसे छोड़ दिया क्योंकि उन्हें लय का ज्ञान नहीं था। वायलिन सीखा, पर असफल रहे। फ्रेंच भाषा और वक्तृत्व कला सीखने की कोशिश की लेकिन उससे नींद आने लगी। अंग्रेज़ बनने की महात्मा गाँधी की यह कोशिश करीब तीन महीने चली। फिर उन्होंने यह विचार ही छोड़ दिया और एक गंभीर विद्यार्थी बन गए। 

भेदभाव का सामना 

जब गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में थे तो एक बार प्रिटोरिया में गाँधीजी नाईं के पास गए। नाई ने उनके साथ बदतमीजी की और उनके बाल काटने से मना कर दिया। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि गाँधीजी “काली चमड़ी’ के थे। महात्मा गाँधी जी उसी समय बाल काटने की मशीन खरीद लाए और उन्होंने अपने बाल खुद ही काट लिए। आगे के बाल काटने में तो थोड़ी बहुत सफलता मिल भी गई, लेकिन पीछे के बाल उन्होंने बिगाड़ लिए। वह अजीब लग रहे थे। उन्हें देखकर न्यायालय में उनके मित्र उन पर हँसने लगे। उन्होंने पूछा, “तुम्हारे बालों को क्या हुआ है गाँधी? क्या इन्हें चूहों ने कुतर डाला?” गाँधी ने बिना शर्माये जवाब दिया नहीं मैंने खुद काटे हैं। 

महात्मा गाँधी पर इसाई धर्म का प्रभाव 

गाँधी जी पर उनके ईसाई दोस्तों ने और बाइबिल के अध्ययन ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा । खासकर ईसा मसीह का व्यक्तित्व पूरे जीवन भर उनको आकर्षित करता रहा।  कई साल बाद जव उन्होंने जोहान्सवर्ग में एक दफ्तर खोला तो ईसा का एक खूबसूरत सिर हमेशा उनकी मेज के ऊपर दीवार पर सजा रहता था। महात्मा गाँधी जी बताते हैं एक बार मैंने सचमुच गंभीरता से ईसाई धर्म स्वीकार करने की बात सोची थी। ईसा का वह सौम्य, इतना धीर, इतना दयालु, इतना प्रेमविहल, क्षमा भावना से इस तरह भरा हुआ व्यक्तित्व जिसने अपने शिष्यों को समझाया कि गाली सुनकर या मार खाकर जवाब न दो बल्कि दूसरा गाल भी आगे कर  दो-मैं समझता या कि संपूर्ण मानव का एक सुंदर उदाहरण है ।‘ 

“लेकिन उन्होंने ईसाई धर्म को स्वीकार नहीं किया, वे कुछ समय तक इसाई धर्मग्रंथों को पढ़ते और उन पर संजीदगी से विचार करते रहे। वे ईसाई धर्म की ओर बहुत अधिक आकर्षित थे। लेकिन आखिरकार वे इस नतीजे पर पहुंचे कि इसाई धर्मग्रंथों में वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है जो हमारे धर्मग्रंथों में नहीं है और इसलिए उन्होंने कहा कि एक अच्छा हिंदू बनने का मतलब यह होगा कि मैं एक अच्छा ईसाई भी हूंगा। ईसा की शिक्षाओं की सुंदरता में विश्वास करने या उनके रास्ते पर चलने की कोशिश करने के लिए मुझे ईसाई धर्म को अपनाने की कोई जरूरत नहीं है। 

उन्होंने आगे कहा -अगर कोई व्यक्ति अपने धर्म की तह तक पहुंच जाए तो वह दूसरे धर्मों की तह तक भी पहुंच जाता है । ईश्वर एक ही है लेकिन उस तक पहुचने के रास्ते अनेक हैं? 

पत्नी से विवाद 

तमाम सामान्य मानदंडों के आधार पर कस्तूरबाई एक समर्पित पत्नी ओर माता थीं। और जिस जाति और समुदाय में पली बड़ीं थीं। उसकी परंपराओं के प्रति आस्थावान थीं।  एक अच्छी पत्नी और मां बनने से अधिक उनकी कोई आकांक्षा भी नहीं थी। वे इच्छा और खुशी से पति की सेवा के लिए तैयार थीं। लेकिन पति घर में रह रहे अजनबी रोगियों के मूत्र का पात्र भी साफ करने के लिए उन्हें मजबूर करें, वे इसका विरोध करती थीं । उनमें एक ईसाई क्लर्क भी था जिसके माता पिता ‘अछूत’ थे। वे उसका मूत्रपात्र साफ करने से घबराती थीं। लेकिन गांधी जी अड़े रहे । वे जिनको सबसे अधिक मानते या अपना समझते थे उनके साथ घोर निर्दयी भी बन जाते थे । इस घटना पर उन्होंने खुद जो कुछ लिखा हैं, उसका उससे अच्छा वर्णन नहीं हो सकता।  

महात्मा गाँधी के शब्दों में

“आज मी मुझें वह दृश्य याद है कि जब वे पात्र हाथ में लिए हुए सीढियों से नीचे उतरीं तो उनकी आंखें गुस्से से लाल थीं और गालों पर मोती से आंसू बह रहे थे, ओर वे मुझें झिढ़कने लगी थीं। लेकिन मैं निर्दयता की सीमा तक दयावान पति था। मैं अपने को उनका शिक्षक समझता था, और इसलिए मैने उनके प्रति अपने अंधप्रेम के कारण उनको परेशान कर रखा था। मैं उनके केवल पात्र ढोने से किसी भी तरह संतुष्ट नहीं था। मैं इसे हंसी-खुशी भी कराना चाहता था। इसलिए मैँने ऊंची आवाज में उनसे कहा मैं अपने घर में यह बदतमीजी बर्दाश्त नहीं करूँगा  “ये शब्द तीर की तरह उनके दिल में चुभ गए। 

वे पलटकर चीखीं ‘अपना घर अपने पास रखो और मुझे जाने दो ।’

मैं खुद को भुला बैठा ओर मेरे अंदर करुणा का स्रोत सूख गया। मैने उनका हाथ पकड़ा, असहाय स्त्री को घसीटकर दरवाजे के पास ले गया जो सीढ़ी के ठीक सामने था, और उनको बाहर धक्का देने के इरादे से उसे खोलने बढ़ा आंसू उनके गालों पर मूसलाधार बह रहे थे, और वे चीखीं “तुम्हें शर्म भी है या नहीं  इस कदर अपने आपको भूल गए हो ? मैं जाऊंगी कहां ? यहां शरण देने के लिए मेरे माता पिता तथा रिश्तेदार भी तो नहीं हैं। तुम सोचते ही, तुम्हारी पत्नी होने के नाते मुझे तुम्हारे लात घूंसे सहने होंगे ईश्वर के लिए अपने को संभालो और दरवाजा बंद करो। हम इस तरह अपना तमाशा तो न बनाए।”

“मैंने अपनी अकड़ बनाए रखी, मगर वास्तव में मैं शर्मिंदा था और मैंने दरवाजा बंद कर दिया। अगर मेरी पत्नी मुझे नहीं छोड़ सकती थीं तो मैं भी तो उसे नहीं छोड़ सकता था। हमारे बीच कई बार खटपट हुई है मगर आखिर में हमारे बीच शांति स्थापित हुई है। अपनी बेमिसाल सहनशक्ति के कारण मेरी पत्नी हमेशा ही जीतती रही है।”

भारत वापसी 

सन् 1901 में भारत लौटने पर गाँधीजी देश की यात्रा पर निकले। कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन में भाग लिया। कांग्रेस के साथ यह उनका पहला संपर्क था। इसी कांग्रेस का भविष्य में उन्होंने नेतृत्व किया। उन दिनों भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी संस्था थी  जिसने भारतीय जनता को अपना राजनीतिक दृष्टिकोण ब्रिटिश सत्ता के सामने रखने का अवसर दिया। कई प्रसिद्ध भारतीय व्यक्ति उसके सदस्य थे और वह एक प्रभावशाली संस्था भी थी, लेकिन उसके निर्णयों का प्रभाव नहीं के बराबर था। सरकार पर अधिवेशन में गाँधीजी को कांग्रेस के कई नेताओं जैसे सर फिरोजशाह मेहता, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस गोपाल कृष्ण गोखले आदि से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। 

गाँधीजी कांग्रेस की कार्य पद्धति से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने देखा कि उसके प्रतिनिधियों में एकता की कमी है। वे लोग अंग्रेजी बोली, वेशभूषा और तोर तरीकों मे पश्चिम की नकल तो करते थे लेकिन कैंप में सफाई रखने की तरफ उनका कतई ध्यान नहीं था। गाँधीजी उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने शौचालय और स्नानघर की सफाई खुद ही शुरू कर दी। कोई उनकी मदद के लिए नहीं पहुंचा। लोगों ने पूछा, ‘अछूत का काम आप क्यों कर रहे हैं?” गाँधीजी ने उत्तर दिया, ‘क्योंकि जाति भाइयों ने इस जगह को ही अछूत बना दिया है। 

महात्मा गाँधी की मृत्यु कैसे हुई? 

30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की दिल्ली के बिरला हाउस में शाम 5:17 पर गांधी जी एक प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे थे ज्यों ही गाँधी जी प्रार्थना स्थल पर आए, नाथूराम गोडसे कोहनी से भीड़ को हटाता हुआ आगे आया और ऐसा जान पड़ा कि वह झुककर गांधीजी को प्रणाम करेगा। उसका हाथ जेब में रखी पिस्तौल को पकड़े हुए था। गोडसे के नमस्कार को तथा उपस्थित व्यक्तियों के आदर‐सूचक अभिवादन को स्वीकार करते हुए गांधीजी ने हाथ जोड़ लिए और मुसकराते हुए सबको आशीर्वाद  दिया। इसी क्षण गोडसे ने पिस्तौल का घोड़ा दबा दिया। गांधीजी गिर पड़े और उनकी जीवन‐लीला समाप्त  हो गई। उनके मुँह से अंतिम  शब्द निकले‐“हे राम !” नाथूराम गोडसे और उसके सहयोगी पर मुकदमा चलाया गया और 1949 में उन्हें मौत की सजा सुनाईं गयी। 

एक ब्लॉग में गाँधी की पूरी जीवन गाथा का वर्णन संभव नहीं है। यदि आप महात्मा गाँधी से जुड़े अन्य रोचक तथ्यों को भी जानना चाहते हैं। तो हमें कमेंट कर के अवश्य बतायें। 

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Sneha Katiyar

My name is Sneha Katiyar. I am a student. I like reading books

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