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राज्यसभा के कार्य एवं अधिकार || Rajya Sabha ke karya

राज्यसभा की रचना 

यह सदन संसद का एक स्थायी, द्वितीय तथा उच्च सदन है। इसका कभी विघटन नहीं होता। राज्यसभा में संघ के इकाई राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं । राज्यसभा में अधिक-से-अधिक 250 सदस्य हो सकते हैं, जिनमें अधिक-से-अधिक 238 निर्वाचित सदस्य तथा 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 2 सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला तथा समाज-सेवा आदि के क्षेत्र में प्रख्यात व्यक्ति होते हैं। इस समय कुल 245 सदस्य हैं,  जिनमें से 233 सदस्य राज्यों तथा केन्द्रशासित का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्वाचित सदस्य हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये गये हैं। 

राज्यसभा सदस्यों का निर्वाचन  कैसे होता है?

राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रीति से होता है। निर्वाचन की दृष्टि से भारतीय संघ के राज्य दो श्रेणियों में विभाजित हैं 

1)वे राज्य जिनमें विधानसभाएँ हैं। 

2) वे राज्य जो केन्द्र द्वारा शासित हैं।

जिन राज्यों में विधानसभाएँ हैं, वहाँ की विधानसभाओं के  सदस्य अपने राज्य के प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। यह चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के द्वारा होता है। वे राज्य जिनमें विधानसभाएँ नहीं हैं अर्थात् जो राज्य केन्द्रशासित हैं, उनके प्रतिनिधियों को निर्वाचित करने का ढंग संसद कानून द्वारा निर्धारित करती है। कौन-सा राज्य कितने सदस्य चुनेगा यह संविधान द्वारा पूर्व-निर्धारित कर दिया गया है। गुप्त मतदान के स्थान पर खुले मतदान का प्रावधान सन् 2003 ई. से किया गया है।

राज्यसभा के सदस्यों की योग्यताएँ क्या होती हैं? 

  • राज्यसभा के उम्मीदवार के लिए आवश्यक है कि वह भारत का नागरिक हो और 30 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो। 
  • वह वे सभी योग्यताएँ रखता हो, जो संसद द्वारा निश्चित  की गयी हों और उस राज्य का निवासी हो जहाँ से वह निर्वाचित होना चाहता है।  
  • संविधान के अनुसार किसी व्यक्ति को संसद की सदस्यता के अयोग्य ठहराया जा सकता है,अगर उसे दसवीं अनुसूची के उपबंधों के अनुसार दल- दल का दोषी पाया गया हो । 
  • यदि कोई सदस्य सदन की अनुमति के बिना 60 दिन की अवधि से अधिक समय के लिए सदन की सभी बैठकों में अनुपस्थित रहता है तो सदन उसका पद रिक्त घोषित कर सकता है।  

राज्यसभा का कार्यकाल कितना होता है? 

यह एक स्थायी सदन है। उसके सदस्यों में से एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष बाद अवकाश ग्रहण करते रहते हैं। इस प्रकार राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। इस सदन के सदस्यों को  को वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और अधिवेशन के  दिनों में दैनिक भत्ता मिलता है। इन्हें प्रतिमास कार्यालय भत्ता भी मिलता है। अवकाशप्राप्त सदस्यों को पेंशन की सुविधा भी प्राप्त है। इन्हें आवास, दूरभाष, चिकित्सा आदि की सुविधाएँ भी प्राप्त होती हैं। 

राज्यसभा का सभापति (उप-राष्ट्रपति) 

भारत का उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। सभापति सदन की बैठकों का सभापतित्व करता है, सभा में व्यवस्था बनाये रखता है, प्रश्नों पर अपना निर्णय देता है तथा मतदान के निर्णय की घोषणा आदि कार्य सम्पन्न करता है। राज्यसभा आपने सदस्यों में से किसी एक को उप-सभापति चुनता है। उप-सभापति के वेतन व भत्ते संसद द्वारा निश्चित किये जाते हैं। सभापति की अनुपस्थिति में उप-सभापति ही सभापति का आसन ग्रहण करता है।  

राज्यसभा के कार्य एवं अधिकार क्या हैं?  

विधायिनी अधिकार

इस सदन में धन सम्बन्धी विधेयक को छोड़कर अन्य किसी भी प्रकार का विधेयक लोकसभा से पहले भी प्रस्तुत किया जा सकता है। कोई भी प्रस्ताव संसद द्वारा तब तक पारित नहीं समझा जा सकता है और उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए तब तक नहीं भेजा जा सकता, जब तक कि वह दोनों सदनों द्वारा पृथक-पृथक पारित न हो जाए। 

जब किसी साधारण विधेयक पर गतिरोध की स्थिति उत्पन हो जाती है तब दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के द्वारा उक्त विधेयक पर निर्णय लिया जाता है। इस संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करता है। इस स्थिति में लोकसभा की सदस्य-संख्या अधिक होने से वह विजयी होता है। अत: राज्यसभा किसी भी विधेयक ‘को कानून बनने से नहीं रोक सकती, वह विधेयक को रोककर मात्र छ: महीने की देरी कर सकती है। 

वित्तीय अधिकार

राज्यसभा की वित्तीय शक्तियाँ लोकसभा की अपेक्षा बहुत कम हैं। वित्त विधेयक लोकसभा में पारित होने के  बाद राज्यसभा में आते हैं। राज्यसभा वित्त विधेयक को 14 दिन तक पारित होने से रोक सकती है।  राज्यसभा वित्त धिधेयक को चाहे रद्द कर दे या उसमें परिवर्त्तन कर दे या 14 दिन तक उस पर कोई कार्यवाही न करे, इन सभी दशाओं में यह विधेयक राज्यसभा से पारित समझा जाता है। 

शासकीय अधिकार

इस सदन की कार्यकारी शक्तियाँ बहुत सीमित हैं। यद्यपि इसके सदस्य भी मंत्रिमंडल में सम्मिलित किये जाते हैं फिर भी मंत्रिमंडल अपने सभी कार्यों के लिए केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता है, राज्यसभा के प्रति नहीं। राज्यसभा के सदस्य प्रश्नों, काम रोको प्रस्तावों और वाद-विवादों के द्वारा मंत्रिमंडल पर अपना नियन्त्रण रखते हैं, परन्तु इस सबके बावजूद भी कार्यपालिका पर राज्यसभा का वास्तविक नियन्त्रण नहीं होता। राज्यसभा को मंत्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उसे हटाने का भी कोई अधिकार नहीं है। 

संविधान संशोधन सम्बन्धी अधिकार

राज्यसभा को संविधान में संशोधन करने का अधिकार लोकसभा की तरह ही प्राप्त है। संविधान संशोधन संम्बन्धी विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत हो सकता है, अर्थात संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव राज्यसभा में भी प्रस्तावित किया जा सकता है। संविधान में प्रत्येक  संशोधन के लिए राज्यसभा के बहुमत की स्वीकृति आवश्यक है, अन्यथा संशोधन नहीं  हो सकता। 

विविध अधिकार

निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भी भाग लेते हैं, किन्तु मनोनीत सदस्यों को वह अधिकार प्राप्त नहीं होता। राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग लगाने और उसकी जाँच करने तथा उसके बारे में निर्णय होने का अधिकार भी राज्यसभा को है। 

उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त राज्यसभा दो कार्य ऐसे भी करती है जिन्हें करने का अधिकार लोकसभा को भी प्राप्त नहीं है। ये दो कार्य निम्नलिखित हैं

1)अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि राज्यसभा अपने उपस्थिति एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत तथा सदन के कुल सदस्यों वो साधारण बहुमत से एक प्रस्ताव पारित कर दे तो संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर कानून बना सकती है। 

यह कानून एक वर्ष के लिए मान्य होगा। यदि कानून को आगे बढ़ाना है तो इस प्रस्ताव को पुन: पारित करना होगा।  

2) अनुच्छेद 312 के अनुसार यदि राज्यसभा अपने उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत तथा सदन के कुल सदस्यों के साधारण बहुमत से एक प्रस्ताव पारित कर दे तो संसद अखिल भारतीय सेवा का सृजन कर सकती है। भारत में अभी तक तीन अखिल भारतीय सेवा मानी गयी हैं 

(1 ) भारतीय प्रशासनिक सेवा 

(2) भारतीय पुलिस सेवा 

(3) भारतीय वन सेवा 

कुछ लोग राज्यसभा की आलोचना करते हुए कहते हैं कि यदि राज्यसभा लोकसभा के सभी कार्यों से सहमत हो तो उसे फालतू सदन कहते हैं और यदि लोकसभा के  कार्यों में बाधा डाले तो अड़ंगेबाज सदन कहा जाता है। अतः राज्यसभा का कोई विशेष महत्व नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है लोकतंत्र में प्रत्येक संस्था का महत्व होता है। यह योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों का सदन है जो कि लोकसभा द्वारा की गयी गलतियों कों सुधारता है। 

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Sneha Katiyar

My name is Sneha Katiyar. I am a student. I like reading books

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