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स्वामी विवेकानंद || Swami Vivekanand ka jivanparichay

स्वामी विवेकानंद का जन्म और बचपन 

स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था 12 जनवरी 1863 में उनका जन्म कलकत्ता के सभ्य परिवार में हुआ था। वर्तमान में उनके जन्म को युवादिवस के रूप में मनाया जाता है। नरेंद्र के पिता कोलकाता के प्रसिद्ध वकील थे इस व्यवसाय में उन्हें अत्यधिक मेहनत करनी पड़ती थी। उनकी माताजी अत्यधिक  भक्तिमय जीवन जीने वाली उच्च चरित्र, उदार, सुशील कर्तव्यनिष्ठ संस्कारों की सजीव प्रतिमा थी। नरेंद्र का शैशव और बाल्यकाल यूरोपीय काल के कलाप्रेमी राजकुमार सा रहा। 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी

उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी और सभी दिशाओं में उन्होंने उसका विकास किया। उनका कंठ बहुत सुरीला था उन्होंने 5 वर्ष तक हिंदू और मुसलमान संगीत आचार्यों के साथ गायन और संगीत का अभ्यास किया वह स्वयं गीत लिखते भी थे। उन्होंने भारतीय संगीत के दर्शन और विज्ञान पर एक संदर्भ ग्रंथ भी प्रकाशित किया। उनके लिए संगीत सदैव एक मंदिर का द्वार था जिससे होकर ही परम तत्व की ओर बढ़ा जा सकता है। कुश्ती,  घोड़े की सवारी करने और नाव खेने का उन्हें शौक था। युवकों के वे नेता और फैशन के नियंता थे। नृत्योत्स्वों  में वह कलापूर्ण नृत्य करते थे। अनेक भारतीय बालकों की भांति उन्होंने बचपन से ही एकाग्र चिंतन का अभ्यास किया।

दार्शनिक विमर्श से उन्हें प्रेम था। चिंतन आलोचना विवेचन की प्रवृत्ति के कारण उनका नाम विवेकानंद पड़ा उन्होंने यूनानी आदर्श का और भारतीय जर्मन चिंतन का समन्वय करने का प्रयास किया सुंदर स्वतंत्रता और तेजस्वी युवक को संसार के सभी सुख उपलब्ध थे पर उसने स्वयं अपने आप पर कड़ा अनुशासन रखा था। 

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स्वामी विवेकानंद की गुरु से भेंट 

जब नरेंद्र 18 वर्ष के थे और वह विश्वविद्यालय की अपनी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे उसी समय उनके धनी मित्र सुरेंद्र नाथ के घर एक छोटा सा उत्सव था। उसी में स्वामी रामकृष्ण परमहंस भी उपस्थित थे। नरेंद्र ने एक मोहक धार्मिक पद गाया। इस अवसर पर राम कृष्ण की तेज दृष्टि ने उन्हें देखा और अपना लिया।  राम कृष्ण ने नरेंद्र से दक्षिणेश्वर आने को कहा और एक दिन नरेंद्र दक्षिणेश्वर जा पहुंचे परंतु वहां पहुंचकर  नरेंद्र को परम हंस एक पागल पुजारी जैसे लगे।

लोग परमहंस को महापुरुष मानते थे कहते थे कि उन्हें ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं। परमहंस मां काली के बहुत बड़े भक्त थे। नरेंद्र को परमहंस की बातें पागल पुजारी के समान लगती थी। उन्होंने परमहंस की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उस दिन वह बिना कुछ कहे सुने मठ से लौट आए। परंतु परमहंस में कुछ अजीब आकर्षण था। तभी तो नरेंद्र कभी-कभी पागल पुजारी के यहां पहुंच जाते थे। 

ईश्वर के दर्शन

एक दिन नरेंद्र ने रामकृष्ण से प्रश्न किया, ‘महाराज क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं’ रामकृष्ण बोले हां बेटा मैंने ईश्वर के दर्शन किए हैं तुम भी ईश्वर  को अपनी आंखों से देख सकते हो इसके लिए तुम्हें मेरे कहने के अनुसार कार्य करना होगा। नरेंद्र कुछ भी नहीं बोले और दक्षिणेश्वर से लौट आये। 

बहुत दिनों तक नरेंद्र परमहंस के पास नहीं गये। उधर परमहंस नरेंद्र के लिए व्याकुल हो उठे। एक दिन उन्हें पता चला कि नरेंद्र ब्रह्मसमाज में बैठे हैं। बस वह वही जा पहुंचे। ब्रह्म समाजियों ने रामकृष्ण का बड़ा अपमान किया। इससे नरेंद्र को बहुत दुख हुआ। उस दिन से उन्होंने ब्रह्मसमाज जाना छोड़ दिया। 

उन्हीं दिनों नरेंद्र के साथ एक विचित्र घटना घटी। एक दिन वह दक्षिणेश्वर में बहुत से भक्तों के साथ बैठे थे। स्वामी रामकृष्ण भक्तों को कुछ बता रहे थे। एकाएक स्वामी जी उठे। नरेंद्र के पास आकर उन्होंने उनके कंधे पर अपना चरण रख दिया। नरेंद्र की दशा ही विचित्र हो गई। उन्हें लगा जैसे सब कुछ मिट गया हो अकेले वही रह गए हों। परमहंस ने अपना हाथ उनके हृदय पर रख दिया। नरेंद्र बिल्कुल ठीक हो गये। तब से उन्हें विश्वास हो गया कि परमहंस एक साधारण मनुष्य नहीं है। बस उन्होंने मन ही मन रामकृष्ण को अपना गुरु मान लिया। 

आर्थिक संकट 

1854 में गति रुक जाने के कारण नरेंद्र के पिता की मृत्यु हो गई। पिता ने आमदनी से अधिक खर्च किया था इसलिए घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी।

6-7 प्राणियों का भरण पोषण और ऊपर से कर्ज का बोझ। उन्होंने नौकरी की खोज की परंतु अपमानजनक व्यवहार के अतिरिक्त उन्हें कुछ ना मिला। निराशा की स्थिति में वे संन्यास लेना चाहते थे परंतु रामकृष्ण परमहंस के समझाने पर उन्होंने अपना निश्चय बदल दिया। 

नरेंद्र आधी रात को मां काली से सुख शांति और धन मांगने गए थे। पर जगदंबा के दर्शन करते ही ऐसे ध्यान में खोये कि सब कुछ भूल गए। बार-बार यही कहते रहे मां विवेक दो, ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो।  स्वामी रामकृष्ण ने पूछा कि क्या मांगा, वह बोले मैं तो परिवार के लिए कुछ मांग ही नहीं पाया। 

परमहंस ने बड़े स्नेह से कहा कि तेरे भाग्य में सांसारिक सुख नहीं है तेरा जन्म मनुष्य जाति के कल्याण के लिए हुआ है पर जा तेरे परिवार वालों को सूखी रोटी और मोटे वस्त्र के लिए कभी कमी नहीं होगी। 

15 अगस्त 1886 को रामकृष्ण ने अंतिम समाधि लगाई और शरीर छोड़ दिया। गुरु के देहावसान के बाद विवेकानंद के सामने यह प्रश्न आया गुरु के द्वारा दिए गए मंत्र को किस रूप में साकार किया जाए। इस बेचैनी ने उन्हें संपूर्ण भारत को स्वतः समझने के लिए एक यात्री बना दिया। 

शिकागो में स्वामी विवेकानंद जी का भाषण 

स्वामी जी ने शिकागो के धर्म सम्मेलन में जाने का निश्चय किया। यद्यपि उनके पास किसी भी प्रकार का निमंत्रण नहीं था, किंतु  वह अपनी बात सम्मेलन में रखना चाहते थे। 

अनेक बाधाओं को पार करते हुए स्वामी जी शिकागो पहुंचे। उन्हें केवल 5 मिनट का समय दिया गया था। स्वामी जी ने अपना भाषण आरम्भ किया। उन्होंने कहा ‘अमेरिका के मेरे प्यारे भाइयों और बहनों’ उन्होंने पहले वाक्य में ही लोगों का मन जीत लिया। स्वामी जी की वाणी ने जैसे जादू कर दिया कई घंटे बीत गये और श्रोता रस के सागर में डूबे रहे। 

स्वामी-विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद

अमेरिका में विवेकानंद को तूफानी हिंदू कहा गया।  धर्म सम्मेलन के बाद स्वामी विवेकानंद अमेरिका में 1 वर्ष रुके। कई जगह उनके भाषण हुए अनेक लोग उनके शिष्य बने और सारे देश में स्वामी जी की ख्याति फैल गई। 

स्वामी जी को इंग्लैंड से आमंत्रण के कई पत्र आये। आखिर में स्वामी जी ने इंग्लैंड जाने का निश्चय किया। जगह-जगह उनके भाषण हुए इंग्लैंड में कुमारी मार्गरेट ई-नोवेल उनकी शिष्या बनीं। बाद में मार्गेट ही संसार में भगिनी निवेदिता के नाम से जानी गईं। 

रामकृष्ण मिशन की स्थापना 

स्वामी जी ने भारत आकर अनुभव किया कि भारत में रूढ़िवादिता और निर्धनता अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। उन्हें कर्म के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। उनका विचार था कि मानव जाति की सेवा के बिना कोई धर्म

पूरा नहीं है। इसलिए उन्होंने अपने साथियों को व्यक्तिगत मोक्ष से अधिक समाज कल्याण के लिए प्रेरित किया। स्वामी जी जिस महान कार्य को संपन्न करना चाहते थे उसके लिए उन्होंने संगठन की आवश्यकता अनुभव की। परिणामतः उन्होंने 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य जनता और देश की सेवा निर्धारित किया गया।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु 

4 जुलाई 1902 को बेलूर में केवल 39 वर्ष की उम्र में स्वामी विवेकानंद परलोकवासी हो गये। वह जो काम कर गये वह एक महान कर्मयोगी के लिए ही संभव था। 

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Sneha Katiyar

My name is Sneha Katiyar. I am a student. I like reading books

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